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Friday, October 15, 2010

2. गिरफ्तारी से पूर्व की त्रासदी।

जैसा कि मैं प्रथम किश्त में लिख चुका हूँ कि 01 मई, 1982 को अपहरण, बलात्कार एवं हत्या के आरोप में मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी को भी पुलिस ने ऐसी नाटकीयता से दिखाया, मानो उन्होंने किसी दुर्दान्त इनामी दस्यू (डाकू) को गिरफ्तार कर लिया हो, जबकि मुझे मेरे ही एक रिश्तेदार ने (भुआ के बेटे) धोखे से गिरफ्तार करवाया था। मैं मेरी तब तक की समझ के अनुसार, किसी भी स्थिति में गिरफ्तार नहीं होना चाहता था। उस समय के मेरे कच्चे मन में मेरे जीवन को बर्बाद करने वाले लोगों के विरुद्द (जिनके बारे में तब तक मुझे कोई जानकारी भी नहीं थी, वे कौन थे) भयंकर गुस्सा था, जिन्होंने झूठे और घिनौने आरोप में मुझे फंसाया था। उनसे बदला लेने के अनेक प्रकार के विचार थे। कुल मिलाकर मैं गिरफ्तार नहीं होना चाहता था।

मैं यहाँ पर यह अवगत करवाना जरूरी समझता हूँ कि जैसे ही मुझे घटना के तीसरे दिन समाचार-पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ कि मैं जिस मन्दिर में रहता था, उसमें एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हो गयी, जिसके आरोप में मन्दिर के पुजारी को पुलिस ने हिरासत में लिया था और बाद में छोड भी दिया था। जिसके कारण गुस्साई आम जनता ने थाने पर पथराव किया और थाने को आग लगाने का भी प्रयास किया गया तो पुलिस ने जनता को बताया कि पुजारी नहीं, बल्कि असली अपराधी दूसरा है।

अपराधी के रूप में मेरा नाम प्रेस को जारी किया गया था। यह सब पढकर मुझ पर क्या गुजरी होगी? इस बारे में आप सिर्फ कल्पना कर सकते हैं! उस दिन की मेरी मनोस्थिति को मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता। यदि घटना के दिन मैं, जिस व्यक्ति के यहाँ पर था, वह साक्षी नहीं होता तो मेरे लिये कम से कम अपनों को तो सिद्ध करना असम्भव था कि मैं घटना वाले दिन अपने कमरे (मन्दिर) पर था ही नहीं। इसके चलते मेरे सभी स्वजनों को बाद में मुझसे मिलने के बाद तो इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया था कि मैं निर्दोष था और षड़यंत्र का शिकार हो चुका था। इस बात से कुछ पाठक मित्रों की यह भ्रान्ति समाप्त हो जानी चाहिये कि मेरे परिवारजनों ने मुझ पर, मेरे निर्दोष होने पर, विश्वास क्यों नहीं किया?
अब सवाल है कि जब परिवारजनों ने विश्वास कर लिया तो फिर परिवारजनों द्वारा मुझे क्यों मृत्यु से भी बदतर सजा दी जा रही है? अन्य अनेक कारणों के अलावा इस बात को भी समाज के समक्ष लाने के लिये यह दास्तां लिखी जा रही है। जिससे कि मेरे माता-पिता, भाई-बन्धुओं के सामाजिक उत्पीडन से दुनिया अवगत हो सके।
जैसा कि सभी जानते हैं कि विद्यार्थी जीवन अनेक प्रकार की उमंगों से भरा होता है, मेरा तो कुल मिलाकर विद्यार्थी जीवन ही 6-7 वर्ष का था, सो मेरा जीवन भी उमंगों से और अनेक प्रकार की आकांक्षाओं से भरा हुआ था। बीए की अन्तिम वर्ष की परीक्षाएँ मई, 1982 में होने वाली थी। मैं पिछले वर्षों से भी अधिक मेहनत कर रहा था। बीए करके अपने राज्य की राजधानी स्थित यूनीवर्सिटी में प्रवेश लेकर अर्थशास्त्र में एमए करने का इरादा था।

मैं जिस कस्बे में पढ रहा था, वहाँ पर 1977 में ही पहला कॉलेज खुला था, सो उस समय तक कस्बे में नौकरियों की प्रतियोगिताओं के बारे में विशेष कुछ जानकारी नहीं मिल पाती थी। फिर भी मेरी चाह थी कि सबसे पहले एमए करके कॉलेज में व्याख्याता बनूँ और फिर आर्थिक समस्या से निजात मिलते ही पूयीएससी की तैयारी करनी है। कलेक्टर बनने या अपने राज्य की पीएसएसी के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में जाने की तीव्र आकांक्षा थी। पता नहीं सफल  हो भी पाता या नहीं, लेकिन आशा तो थी ही।

सारी की सारी उमंगें समाचार-पत्र में बलात्कारी और हत्यारे के रूप में अपने आपका नाम पढकर धडाम से टूट गयी। ऐसा लगा मानो मुझे कई मंजिल ऊपर से बेहरहमी से जमीन पर फैंक दिया गया हो और मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से पंगु हो गया हूँ। किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा मैं सोच ही नहीं पा रहा था कि किया क्या जाये? बस एक ही विचार बार-बार दिमांग में कौंध रहा था कि पुलिस ने पकड़ लिया तो बहुत मारेगी। प्रकाशित समाचार के अनुसार कस्बे का माहौल बहुत खराब था। आम लोगों का आक्रोश सातवें आसमान पर था। जिसके चलते छोटे से कस्बे का नाम राज्य के सबसे बड़े समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ पर था। मैं उस समय भी इतना तो जानता ही था कि पहले पृष्ठ पर खबर छपने का मतलब क्या होता है।

ऐसे में मैंने, जिनके यहाँ पर था, उनसे सलाह की, मुझे सलाह दी गयी कि यदि इस समय मैं जनता की पकड़ में आ गया तो जनता मुझे जान से खतम भी कर सकती है। अत: कुछ समय तक इधर-उधर गायब रहना ही ठीक होगा। इसके अलावा मैंने भी अपने तब के विवेक से पुलिस की गिरफ्तारी से बचने का निर्णय लिया और कहीं दूर, अनजान जगह पर भाग जाने का तय किया, लेकिन कहाँ? तब तक मुझे अपने तहसील मुख्यालय से आगे का तो कोई ज्ञान था ही नहीं। इससे पूर्व एक बार दो दिन के लिये अपने राज्य की राजधानी में गया। अन्यथा मेरा तब तक जीवन अपने गाँव और तहसील मुख्यालय तक ही सीमित था।

विपन्नता को खूब सहा था। हमेशा हाथ तंग रहता था। मेरी जेब में उस समय कोई 10 रुपये तथा कुछ चिल्लर ही थी। बस या रेल में यात्रा करने पर किसी के द्वारा पहचाने जाने का भय (क्योंकि समाचार-पत्रों में मेरा फोटो भी छप चुका था) और जेब में बचे रुपयों के खर्च हो जाने के बाद क्या होगा, यह सवाल भी मुंह बाये सामने खड़ा था? फिर भी उस विकत स्थिति में कोई न कोई निर्णय तो लेना ही था। जिनके यहाँ रुका था, उनसे रुपये मांगने ही हिम्मत नहीं हुई और उन्होंने आगे से ममद के लिये कहा नहीं। उनकी आर्थिक दशा भी बहुत अच्छी नहीं थी, हो सकता है, उनके पास भी उस समय धनाभाव रहा हो?

पाठक तय करेंगे कि मेरा निर्णय कितना सही था, लेकिन मैं आज भी मानता हूँ कि मेरा निर्णय सौ फीसदी सही था। मैंने अपने कस्बे को ही नहीं, बल्कि अपने जिले की सीमा को भी पार करने का तय कर लिया। लेकिन कुछ दूरी तय करते ही कदम रुक गये। अपने आपसे मैंने एक सवाल किया, किस रास्ते से जाओंगे? रास्ते में किसी ने पहचान लिया तो क्या होगा? तब बिना रास्ते जंगल और खेतों में होकर चलने का विचार आया तो फिर सवाल उठा कि कोई पूछेगा कि रास्ते के बजाय मैं इस प्रकार बेरास्ता क्यों भटक रहा हूँ तो क्या जवाब दूँगा? कॉलेज के कपड़ों में इस प्रकार भटकने पर कोई भी मुझ पर आसानी से सन्देह कर सकता था।

कुछ क्षण सोचा और अपने थैले (बैग रखने लायक तो आर्थिक स्थिति थी नहीं, मेरे पास कपड़े का सिला हुआ एक साधारण थैला था, जो कहीं आने-जाने के समय जरूरी कपड़े रखने के लिये उपयोग किया जाता था। जिसे मैं कस्बे से बाहर जाते समय अपने साथ ले गया था) को मैंने देखा उसमें एक जोडी अण्डरवियर-बनियान, तौलिया, शर्ट और लुंगी रखी थे। मैं कॉलेज के दिनों से अभी तक सफारी शूट पहनने का शौकीन हूँ। (यह भी मेरी पहचान का संकेत है।) उस दिन भी सफारी शूट पहन रखा था। सफारी शूट झटपट उतारा और थैले में रखी लुंगी लपेटी, शर्ट पहनी और तौलिया को सिर पर ऐसे बांध लिया जैसे कि गाँव के लोग बांधते हैं और सफारी शूट को थैले में रख लिया। एक बार फिर से गाँव के चरवाहे का रूप धारण कर लिया और अपने कल्पित (सोचे) मार्ग पर निकल लिया। अब लोग पूछेंगे कि बेरास्ता क्यों चल रहे हो तो इसका मेरे पास जवाब था-"मेरी भैंसें कहीं खो गयी हैं, उन्हें ढूँढ रहा हूँ, क्या कहीं देखा है?" गर्मियों के समय अकसर ग्रामीणों की भैंसें गाँव का रास्ता भटक जाती हैं, जिन्हें ढूँढने वाले इसी प्रकार खेत-खेत और जंगल-जंगल भटकते रहते हैं। मैं भी पूर्व में इस प्रकार अपनी भैंसों को ढूंढते हुए अनेक बार भटक चुका था।

मैं खेतों को पार करते हुए, चला जा रहा था। रास्ते में एक कुआ आया। पानी पिया और पेड़ की छांया में तौलिया बिछाकर लेट गया, नींद आ गयी और जब नींद खुली तो रात्री होने को थी। कुए के मालिक ने ही जगाया था। पूछा तबियत तो ठीक है? कुछ खाया है या नहीं? (मैं सोने से पहले ही उसे भैंस खोजने वाली बात बतला चुका था।) कहते हुए उसने अपने खेत के कुछ फल मुझे खाने को दे दिये। खाकर सन्तोष हुआ कि चलो आज का दिन तो खाली पेट नहीं सोना पड़ेगा। पानी पीकर चलने को हुआ तो कुआ मालिक बोला रात्री हो गयी है, कहाँ जाओगे यहीं सो जाओ। अपने अन्दर से एक आवाज आयी कि रात्री गुजारने का अच्छा अवसर है, लेकिन तत्काल दूसरी आवाज भी आ गयी रातभर कुआ-वाला तरह-तरह की बात करेगा और नाम-गाँव पूछेगा तो मेरी असलियत पता चल सकती है। सो तय किया कि "नहीं मुझे गाँव में भैंसें तलाशनी हैं। चलता हूँ" और बिना एक क्षण रुके या बिना कुए वाले के प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा किये चल दिया।

चलते-चलते रात हो गयी। रात कैसे गुजारी जाये? यह सवाल अभी भी बार-बार कौंध रहा था। बस सन्तोष इतना सा था कि गर्मी का मौसम होने के कारण सर्दी का भय नहीं था। इसी उधेड़बुन में कई किलोमीटर तक चलते-चलते मैं फिर एक कुए पर पहुंच गया। तब तक रात्री के कोई 10 बज गये थे। कुए के पास में ही लेज (रस्सी)-बाल्टी पड़ी थी। (उस जमाने में किसान अकसर अपने कुआ पर लेज-बाल्टी रखे रखते थे, जिससे कि कोई भी राहगीर प्यासा कुए पर आये तो प्यासा वापस नहीं जाये।) बाल्टी कुए में डाली पानी पिया। कुए पर कोई नहीं था, एकदम सन्नाटा छाया हुआ था। दूर कहीं सियारों की आवाज सुनाई दे रही थी। कुछ दूरी पर दियों (दीपकों) की जुगनू की भांति टिमटिमाती रोशनी से किसी गाँव या आबादी का अहसास हो रहा था। कुआ के पास में ही एक झोंपडी बनी हुई थी। जिसमें अंधेरे में कहीं कुछ नहीं दिख रहा था। उस दिन धूम्रपान नहीं करने की आदत पर भी अफसोस हुआ कि काश धूम्रपान करता होता तो साथ में माचिस तो होती और माचिस जलाकर देख सकता था कि झोंपडी के अन्दर क्या है? खैर अंधेरे में ही झोंपडी से दूर सुनसान खेत में अपना तौलिया बिछाया और अपने थैले का तकिया बनाकर सो गया। हालांकि जंगल में इस प्रकार अकेले में सोने में कई प्रकार के भय भी थे, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प भी तो नहीं था।

दिन में सो लेने और भयाक्रान्त हालातों के कारण इतना तनाव था कि नींद कहीं दूर-दूर तक भी नहीं भटक रही थी, लेकिन विचार तन्द्रा में न जाने कब आँख लग गयी, कुछ घण्टे सोया। सूर्योदय से पूर्व ही जागा और नैतिक क्रियाकर्मों से निवृत होकर चल दिया। 07 बजे तक मैं अपने जिले की सीमा पार कर चुका था और सांझ होते-होते मैं अपने आराध्य के प्रांगण में था।

इस प्रकार मेरे दिन और रात नये-नये अनुभवों के साथ गुजरते गये, लेकिन मुझे आपको यह बतलाते हुए आश्चर्य हो रहा है कि इतने दिनों तक मेरी जेब में रखे रुपयों में से मुझे दो-तीन रुपये ही खर्च करने पडे, जो भी खाने पीने पर नहीं, बल्कि माचिस, मोमबत्ती और साबुन खरीदने पर, स्वेच्छा से खर्चे। आगे से आगे मेरे खाने और ठहरने की व्यवस्था होती गयी।

हालांकि इस बीच एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के रास्ते पेड़ की डाली को हटाकर निकलते समय काला सांप मेरे सिर से मात्र कुछ इंच की दूरी पर जीभ लपलपा रहा था और मेरे लिये पेड़ को हिलाये बिना, पेड़ के नीचे से निकल पाना असम्भव था।

खैर जैसे-तैसे सब कुछ निकल गया और भटकते-भटकते एक रिश्तेदार के सम्पर्क में आया, वह मुझे सामने देखते ही ऐसे घबराया मानो उसने किसी जिन्द को देख लिया हो, उसने झटपट मुझे अन्दर छिपा दिया और वहीं पर मेरे खाने-पीने की व्यवस्था कर दी। एक दिन और एक रात मुझे सूरज के दर्शन नहीं करने दिये। इस बीच उसने मेरे परिवारजनों एवं अन्य रिश्तदारों से सम्पर्क किया और उनकी सलाह पर मुझे मेरी बुआ के यहाँ जाने की सलाह दी हालांकि साथ ही हिदायत दे दी कि मैं बुआ के गाँव में नहीं, बल्कि उनके खेत पर जाऊँ और रात्री को पहुँचू, वहाँ पर मुझे आगे की जानकारी दी जायेगी।

कुछ दिनों की पैदल यात्रा के बाद जैसे-तैसे मैं भुआ के खेत पर पहुँचा, उन सभी ने भी मुझे खेत पर जानवरों के लिये बन बाड़े के झोंपडों में छिपाकर रखा और अगले दिन (01.05.1982) सुबह मुझे बाहर आने को कहा। पास में ही बह रही नदी पर नहाया और खाना खाया। मुझे बताया गया कि किसी बड़े आदमी से सिफारिश करवादी गयी है, इसलिये जल्द ही मामला समाप्त हो जायेगा। साथ ही मुझे किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करने की सलाह दी गयी और इसी प्रकार की बातें करते हुए मेरी बुआ के लड़के मुझे अपने खेत से गाँव की ओर साथ लेकर चल दिये। कोई आधा किलोमीटर चलने के बाद एक पेड़ के नीचे पुलिस की जीप दिखी थी। मैंने बुआ के लड़के से कहा कि ये क्या है? उसने कहा "मेरे पास-और कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि पुलिस ने मामाजी को (मेरे पिताजी को) थाने पर बिठा रखा है! इसलिये तेरी गिरफ्तारी जरूरी है।" मैं भाग भी नहीं सकता था, फिर भी उन्हाने मेरा हाथ इस प्रकार से पकड़ लिया जैसे कि मैं भाग नहीं सकूँ। पुलिस को देखने के बाद और भुआ के लड़के की असलियत सामने आते ही मेरे मन में न जाने कितने प्रकार के विचार और सवाल-जवाब कौंध गये। लेकिन मेरे पास कोई रास्ता शेष नहीं था।

कुछ कागजी खानापूर्ति करने के बाद पुलिस मुझे पास के थाने पर ले गयी, जहाँ पर पुलिस ने हाथ में हथकड़ी डालकर और मेरी बुरी दशा में ही मेरे फोटो निकलवाये। फोटो निकालने वाला मेरा कई वर्ष पूर्व का परिचित व्यक्ति था और वह मुझे बहुत इज्जत देता रहा था, लेकिन उस दिन वह एक अपराधी के रूप में मेरा फोटो निकाल रहा था। इस थाने से मुझे उस थाने पर ले जाया गया, जहाँ पर मेरे खिलाफ मामला पंजीबद्ध था। जहाँ पहुँचते ही मुझे हवालात में बन्द कर दिया। हवालात में पहले से ही एक अन्य व्यक्ति बन्द था, जिसके बारे में पूछताछ करने पर पता चला कि वह सीमान्त प्रान्त का इनामी डकैत था।

नोट : हवालात में क्या-क्या हुआ और पुलिस का व्यवहार कैसा रहा? आदि विषयों पर आगे लिखूँगा, लेकिन इससे पूर्व पाठकों से अनुरोध है कि-
-कृपया मुझे अपनी राय से अवगत करावें कि हवालात में और बाद में जेल में अनेक अच्छे-बुरे (मेरी राय में) कैदियों, से मेरी मुलाकात होनी है, जिनमें से कुछेक की संक्षिप्त दास्ताँ भी समाज, न्यायिक, पुलिस और जेल व्यवस्था पर प्रकाश डालने वाली है।
-मेरा सवाल है कि क्या मैं, इन सभी के बारे में भी संक्षेप में लिखूँ या सिर्फ अपनी दास्तान तक ही सीमित रहूँ। वैसे फिल्मों के आधार पर कोर्ट, पुलिस और जेल को जानकर, इन सब के बारे में राय बनाने वाले पाठकों के लिये यह एक अवसर है कि इन सबकी असलियत को जानें और समझें। कृपया अपनी राय से खुलकर अवगत करावें।
-यहाँ पर आप सभी पाठकों से निवेदन है कि कृपया विश्वास करें कि जो भी लिख रहा हूँ, उसमें अतिरंजना को दूर रखकर, शतप्रतिशत सच्चाई, बल्कि सच्चाई को भी संक्षेप में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।
-हाँ कोर्ट के मामले में संयमित भाषा का उपयोग करना मेरी विवशता होगी है, क्योंकि न्यायिक अवमानना की तलवार कोर्ट की ओर से हमेशा टंगी रहती है। इस बारे में भी आगे चलकर मैं विधि एवं न्याय व्यवस्था से जुड़े पाठकों की राय जानने का अनुरोध करूँगा।
क्रमश: जारी.........
1- मैं यह अवश्य चाहता हूँ कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये  या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

3- यदि आप मुझे मेल करना चाहें तो मेरा मेल आईडी निम्न है। कृपया व्यक्तिगत पहचान प्रकट करने वाले सवाल नहीं करे।
umraquaidi@gmail.com 
2- थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा। 
पाठकों की प्रतिक्रियाओं का इन्तजार.............. 

27 comments:

  1. आप अपने पूरे अनुभव हमें बताये . जिस से उन लोगो की सच्चाई भी सामने आये .
    अगर आप निर्दोष थे तो ये महा अन्याय था .
    जिस प्रकार आप निर्दोष थे उसी प्रकार पुजारी भी तो निर्दोष हो सकता है .आप का पुजारी को बिना सबूत अपराधी घोषित कर देना आप को उन लोगो की ही श्रेणी में खड़ा कर देता है जिन्हों ने ये अन्याय किया .

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  2. aapka dono post padha..aur aage padhna chahta hun..ye jaanne ki ichchha hay ki zindagi ki kahani ab kaya mod leti hay.

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  3. बढिया, आगे का इंतजार है।

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  4. श्री अभिषेक जी हमें इस चर्चा में शब्दों का प्रयोग बहुत संभल कर करना चाहिए, कम से कम कानून केवल शब्दों को ही पकड़ता है.
    आपने जिन शब्दों का प्रयोग किया है, उनका मैंने कहीं भी प्रयोग नहीं किया है, श्री अभिषेक जी आप तुलना करके देखे.

    आप लिखते हैं कि-"आपका पुजारी को बिना सबूत अपराधी घोषित कर देना आपको उन लोगो की ही श्रेणी में खड़ा कर देता है, जिन्होंने ये अन्याय किया."

    जबकि मैंने लिखा है कि-"इसी दिन कथित रूप से मन्दिर के पुजारी (अब दिवगंत) ने एक 13 वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार किया। बलात्कार के अगले दिन रहस्यमय परिस्थितियों में बच्ची की मृत्यु हो गयी। पुलिस ने घटनास्थल से पुजारी को पकड लिया। स्थानीय लोगों का कहना था कि मृत्यु से पूर्व बच्ची ने पुजारी के खिलाफ बयान भी दिया था।"

    "कथित रूप से" का मतलब तो आप समझते ही होंगे.

    हाँ आपकी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि-"जिस प्रकार आप निर्दोष थे उसी प्रकार पुजारी भी तो निर्दोष हो सकता है."

    मैंने कभी नहीं कहा कि पुजारी दोषी था, लेकिन मैं उन्हें निर्दोष होने का प्रमाण-पत्र भी नहीं दे सकता! इस प्रकरण में मेरे आलावा सर्वाधिक संदेहास्पद व्यक्ति पुजारी ही था, जिसका उल्लेख न्यायिक कार्यवाही में भी है.

    आपने बुधिमात्पूर्ण टिप्पणी की है और एक वाजिब सवाल उठाया है. जो न्यायिक द्रष्टिकोण के जरूरी है. लेकिन यदि ये सवाल आपने पहली पोस्ट में उठाया होता तो अधिक प्रासंगिक था, क्योंकि अब ये आफ्टर थोट में शामिल हो गया है.

    फिर भी टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

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  5. हिम्मत न हारिये.........
    बिसारिये न राम.

    बन जायेंगे सभी बिगड़े काम.


    किसी की जिदगी में दुःख ज्यादा होते हैं और खुशियाँ कम........
    बस इसससे ज्यादा कुछ नहीं है......

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  6. आप ने जो भी लिखा है इस बार बहुत विस्तार पूर्वक लिखा आगे भी लिखते रहिये आगे की कहानी जानने का मन हर किसी का होगा मेरा भी है किन्तु मुझे नहीं लगता के आप को अन्य कैदीयौं के बारे में विस्तार पूर्वक बाताने की आवश्यकता है क्यूँ अभी तो आप का लेख बहुत रोचक लग रहा है माफ़ किये जिए गा किसी कि आप बिति दुखाद घटना को रोचक कह ना ठीक बात नहीं मगर फिर आगे क्या हुआ यह जाने की उत्सुकता तो सभी को है ..और यदि आप SHORT में लिखेगे तो मेरे समझ से ज्यादा अच्छा होगा दूसरी बात जो आप ने अपने एक कधी में कही है कि और अन्य लोगोने आप कोTV serial वालों के पास जाने तक कि सलाह दी है और आप ने प्रयास भी किया है यह इस विषये में उनकी सहयता चाही है मेरे समज से तो भले ही आप कि आर्थिक सहायता करसके मगर आप ने जीवन के कडवे सच को और इतने बड़े अघात को जो आप के न केवल शरीर पर बल्कि आप कि अपनी अन्तर आत्मा तक को घायल कर चुका है उससे मीडिया वालों को देंना खुद अपना मजाक बनवाने जैसा है और ऐसा में इसलिए कह रही हूँ क्यूँकि मुझे आज कल के मीडिया पर ज़रा भी भरोसा नहीं है जो इन्सान की कहानी पर कम अपनी TRP बढ़ने पर ज्यादा रूचि रखते है आगे आप कि मर्ज़ी है जैसा आप को ठीक लगे... जय हिंद ....

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  7. आप की कहानी अपने समाज मेँ व्याप्त विसंगतियोँ को बयाँ करता है । दिग्भ्रमित समाज की प्रताड़ना से हर साल कई युवायोँ को बिना वजह कानूनी पचड़ोँ मेँ पड़कर अपनी आकांक्षाओँ की बलि देना पड़ता है । समाजिक बुड़ाईयोँ के प्रसार को नियंत्रित करने की आपकी पहल के लिये धन्यवाद । जरूरत इस बात की है कि हम इसे एक "सतत् आन्दोलन " का स्वरुप प्रदान करेँ ।

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  8. श्री singhsarojkumar जी धन्यवाद! क्या आप ऐसे सतत् आन्दोलन से जुडकर, उसके संचालन के लिये-तन, मन और धन से सहयोग करने और अन्य लोगों से करवाने को तैयार हैं?

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  9. आदरणीय पल्लवी जी,

    आत्मीय संवदेनाओं से ओतप्रोत आपकी टिप्पणी पढकर ऐसा लगा मानों कोई गहरे से जुडे आत्मीय शुभचिन्तक की टिप्पणी है। आपने जो कुछ कहा है, उसे मैं समझ सकता हूँ। मेरा इरादा धन के लिये अपनी वेदनाओं को बेचने का तनिक भी नहीं है, लेकिन मैं यह अवश्य चाहता हूँ कि कडवा सच जनता के सामने आये बेशक उसके कारण मेरे घाव फिर से बार-बार जिन्दा होते रहें, वैसे भी मेरे घाव भरे कहाँ हैं। मेरे घावों को तो प्रतिपल कोई न कोई खरोंचता ही रहता है।

    कैदियों या निर्दोंषों को सजा से जुडी ढेरों कहानियाँ लिखी जाती हैं। फिल्में भी बनती हैं, लेकिन इनमें आंशिक या केवल सांकेतिक सच्चाई होती है। समाज कितना निर्मम है, पुलिस और अदालतें क्या-क्या कर करती हैं? इससे अभी भी हमारा समाज और समाज का बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह से वाकिफ नहीं है। ऐसा मेरा मानना है। हो सकता है कि मैं इस बारे में गलत भी होऊँ, लेकिन फिर भी जन-जन तक अपनी बीति के बहाने इन पहलुओं को बतलाने में क्या नुकसान है? धन मिले न मिले, इसकी परवाह नहीं। मिलेगा तो समाज में बहुत सारे ऐसे जरूरतमन्द लोग हैं, जिनके काम आयेगा।

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  10. बीती को बिसार देना समझदारी नहीं. बस बीती अपने लिये सैडिस्ट न बन जाये, इसका ध्यान रखना चाहिये. बीती से शिक्षा लेना आवश्यक है. यदि, आप के द्वारा लिखी गई सभी बातें सत्य हैं (इसलिये क्योंकि सच-झूठ आपसे बेहतर कोई नहीं जानता) तो - एक आप अब तक ठीक ठाक एस्टैबलिश हो चुके होंगे, दूसरा आप का आत्मकथन औरों के लिये मार्गदर्शन का कार्य करेगा. पुलिस, जेल और अदालती कार्यप्रणाली के बारे में खुलकर लिखें.. इस विश्वास के साथ कि आप का लिखा एक-एक शब्द सत्य है..

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  11. आरदणीय श्री भारतीय नागरिक जी,
    नमस्कार।

    आपने मेरे ब्लॉग पर आकर सकारात्मक टिप्पणी दी। धन्यवाद एवं आभार।

    विश्वास रखें आपको सत्य और सत्य के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। अनेक लोगों के जीवन सत्य के कारण बर्बाद हो जाते हैं, इसलिये तथ्य (नाम, पते) अवश्य ही बदल दिये जायेंगे।
    ---------------
    आपके ब्लॉग पर आकर जो तकनीकी समस्या की जानकारी पढी है, उससे बचाव के लिये वेब आपने एवं आपके पाठकों ने ठीक विकल्प समझा है। लेकिन आर्थिक या अन्य कारणों से वेब नहीं ले सकने तक ब्लॉग की सुरक्षा के लिये कुछ संरक्षणात्मक सुझाव हों तो कृपया जरूर बतायें।
    आशा है आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। शुभकामनाओं सहित।
    "उम्र कैदी"

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  12. sir ji aapka blog pada aur pad kar achchha laga ki apke k sath itna kuch hone k bad bhi apke andar ek ajib sa utsah aur shakti hai. jiske vajh se aap ek din bahut aage jayege. bahut kam hi log hote hai jo ek bar itna girne k bad uth pate hai, apke himmat ko mera salam... bas himmat mat hariyega. aur age badhiyega..
    apka comment mere post k bare me pad kar achchha laga asha hai age bhi apka sahyog milta rahega. apka ek dost allahabad se ..... kinjal

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  13. This comment has been removed by the author.

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  14. उम्रकैदी जी की जय हो..
    आप की आपबीती पढ़ कर दुःख भी हुआ लेकिन अच्छा भी लगा.
    दुःख इसलीये हुआ क्योंकि आपकी ज़िन्दगी बर्बाद हो गयी सारे सपने टूट गये... भगवान किसी के साथ ऐसा न करे.
    और अच्छा इसलिए लगा कि आप अपना भूत( पास्ट) सब के सामने उजागर कर रहे हैं जिससे
    और किसी पर ऐसी अगर बीती हो तो उसे सहानुभूति और सिक्षा मिलेगी.
    और साथ ही में हिंदी भाषा का प्रेमी हूँ
    आपका हिंदी ब्लॉग देख कर बहुत कुछ नया सीखने को मिला है..

    आपका
    रोब्बी ग्रे !

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  15. उम्रक़ैदी जी,
    आपकी व्यथा-कथा पढ़कर बहुत दःख हुआ,मैं आशा करता हूँ..और कामना भी कि आपका भविष्यत्‌-पथ सुखमय होगा...तथास्तु!

    आप यदि निर्दोष हैं, तो प्रभु आपको उबारेंगे...कोई साथ दे या न दे, वह ‘परमसत्ता’...वह ‘महान्यायालय’ अपना फ़ैसला न्यायपूर्ण ढंग से ही देता है। हाँ... थोड़ी देर अवश्य हो सकती है!
    ________________________________
    पुनश्च, यह संयोग देखें कि मेरे और आपके ब्लॉग का टेम्पलेट हू-ब-हू (एकदम ditto) है।

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  16. भाई...!
    ग़म से कुछ पल बाहर आइए,
    थोड़ा हँसिए और मुस्कराइए।

    मेरे और आपके ब्लॉगके टेम्पलेट की यह समानता मुझको यह एहसास करा रही है कि मैं भी ‘उम्रक़ैदी’ ही हूँ। अंतर सिर्फ़ इतना कि-

    आप ‘ज़बरन’(जैसा कि आप कहते हैं) उम्रक़ैदी बनाये गये हैं, क़ानून के उम्रक़ैदी!

    ...और मैं--- ‘जानबूझकर’ उम्रक़ैदी बन गया, अपनी इकलौती धर्मपत्नी का उम्रक़ैदी!
    _____________________________
    मेरा सात्विक उद्देश्य आपको थोड़ा हँसाना/गुदगुदाना-मात्र है, किसी प्रकार का तंज मेरा अभीष्ट कदापि नहीं...सो अन्यथा न लीजिएगा!

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  17. आपका हिंदी ब्लॉग देख कर बहुत कुछ नया सीखने को मिला है..
    हाँ मैं आप के साथ इस पोस्ट पूरी तरह से सहमत हूँ ..
    आशा है आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। शुभकामनाओं सहित।
    कौशल मनीष

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  18. aapke sanghrshmai jeewan ke sambandh me kuch jankari mili.
    Main sarkari karyon ke silsile mein bivinna saharon mein wigat pachchish warshon se yatra kar raha hun.Hamare MAHAN Desh me aap jaise kai nirparadh apradhi paye jate hain.
    main aasha kar raha hun ki abhi aap wigat tiktata se mukt ho chuke honge. isliye biti tahi bisar de kahate huye nayee jindegi ki hardik subhkamanayen.
    Likhte rahiye taki man ka mail nikalta rahe.

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  19. आपकी दास्ताँ पढ़कर मन व्यथित हुआ . आपने अपनी व्यथा ब्लॉग के माध्यम से सबके सामने रखने का जो साहस किया वह बहुत अच्छा लगा, निश्चित ही इससे मन को कुछ तो सुकूँ मिलता ही है.. ...हमारे सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने समाज में न जाने कितने दुखी,पीड़ित होंगें, जिनकी व्यथा शायद ही कोई संवेदनशीलता पूर्वक सुनना चाहेगा ... मदद तो कोसो दूर की बात है! ....
    आपकी वेदना बहुत गहरी है... लेकिन इसमें इतना ही कहूँगी की आपको बजाय किसी और के मुहं ताकने के अपनी आंतरिक ताकत से उठ खड़े होकर इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए प्रयास करना होगा... आज के समय में कहाँ-कहाँ हम मदद की गुहार लगायेगें.. और कितने हैं जो गुहार सुनकर साथ देने को राजी हो पाते हैं.... दूसरे की लगाई हथेली कब सरक जाय कोई भरोसा नहीं... इसलिए अपनी ताकत खुद बनकर अपनी स्वयं की पहचान जो बना लेता है उसे ही लोग आज के समय में पूछते है ....... ईश्वर आपकी यह व्यथा शीघ्र दूर करे यही प्रार्थना है....

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  20. शकुन्तला प्रेस कार्यालय के बाहर लगा एक फ्लेक्स बोर्ड देखे.......http://shakuntalapress.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html क्यों मैं "सिरफिरा" था, "सिरफिरा" हूँ और "सिरफिरा" रहूँगा! देखे.......... http://sach-ka-saamana.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html

    आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-अगर आपको समय मिले तो कृपया करके मेरे (http://sirfiraa.blogspot.com , http://rksirfiraa.blogspot.com , http://shakuntalapress.blogspot.com , http://mubarakbad.blogspot.com , http://aapkomubarakho.blogspot.com , http://aap-ki-shayari.blogspot.com , http://sachchadost.blogspot.com, http://sach-ka-saamana.blogspot.com , http://corruption-fighters.blogspot.com ) ब्लोगों का भी अवलोकन करें और अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे ब्लोगों की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे.हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं # निष्पक्ष, निडर, अपराध विरोधी व आजाद विचारधारा वाला प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकार, कवि व लेखक रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" फ़ोन:9868262751, 9910350461

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  21. दोस्तों! अच्छा मत मानो कल होली है.आप सभी पाठकों/ब्लागरों को रंगों की फुहार, रंगों का त्यौहार ! भाईचारे का प्रतीक होली की शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन परिवार की ओर से हार्दिक शुभमानाओं के साथ ही बहुत-बहुत बधाई!

    आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-अगर आपको समय मिले तो कृपया करके मेरे (http://sirfiraa.blogspot.com , http://rksirfiraa.blogspot.com , http://shakuntalapress.blogspot.com , http://mubarakbad.blogspot.com , http://aapkomubarakho.blogspot.com , http://aap-ki-shayari.blogspot.com , http://sachchadost.blogspot.com, http://sach-ka-saamana.blogspot.com , http://corruption-fighters.blogspot.com ) ब्लोगों का भी अवलोकन करें और अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे ब्लोगों की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे.हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं

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  22. हर वो भारतवासी जो भी भ्रष्टाचार से दुखी है, वो देश की आन-बान-शान के लिए समाजसेवी श्री अन्ना हजारे की मांग "जन लोकपाल बिल" का समर्थन करने हेतु 022-61550789 पर स्वंय भी मिस्ड कॉल करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे. यह श्री हजारे की लड़ाई नहीं है बल्कि हर उस नागरिक की लड़ाई है जिसने भारत माता की धरती पर जन्म लिया है.पत्रकार-रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

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  23. भ्रष्टाचारियों के मुंह पर तमाचा, जन लोकपाल बिल पास हुआ हमारा.

    बजा दिया क्रांति बिगुल, दे दी अपनी आहुति अब देश और श्री अन्ना हजारे की जीत पर योगदान करें

    आज बगैर ध्रूमपान और शराब का सेवन करें ही हर घर में खुशियाँ मनाये, अपने-अपने घर में तेल,घी का दीपक जलाकर या एक मोमबती जलाकर जीत का जश्न मनाये. जो भी व्यक्ति समर्थ हो वो कम से कम 11 व्यक्तिओं को भोजन करवाएं या कुछ व्यक्ति एकत्रित होकर देश की जीत में योगदान करने के उद्देश्य से प्रसाद रूपी अन्न का वितरण करें.

    महत्वपूर्ण सूचना:-अब भी समाजसेवी श्री अन्ना हजारे का समर्थन करने हेतु 022-61550789 पर स्वंय भी मिस्ड कॉल करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे. पत्रकार-रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना हैं ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

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  24. देश और समाजहित में देशवासियों/पाठकों/ब्लागरों के नाम संदेश:-
    मुझे समझ नहीं आता आखिर क्यों यहाँ ब्लॉग पर एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना चाहते हैं? पता नहीं कहाँ से इतना वक्त निकाल लेते हैं ऐसे व्यक्ति. एक भी इंसान यह कहीं पर भी या किसी भी धर्म में यह लिखा हुआ दिखा दें कि-हमें आपस में बैर करना चाहिए. फिर क्यों यह धर्मों की लड़ाई में वक्त ख़राब करते हैं. हम में और स्वार्थी राजनीतिकों में क्या फर्क रह जायेगा. धर्मों की लड़ाई लड़ने वालों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूँ. क्या उन्होंने जितना वक्त यहाँ लड़ाई में खर्च किया है उसका आधा वक्त किसी की निस्वार्थ भावना से मदद करने में खर्च किया है. जैसे-किसी का शिकायती पत्र लिखना, पहचान पत्र का फॉर्म भरना, अंग्रेजी के पत्र का अनुवाद करना आदि . अगर आप में कोई यह कहता है कि-हमारे पास कभी कोई आया ही नहीं. तब आपने आज तक कुछ किया नहीं होगा. इसलिए कोई आता ही नहीं. मेरे पास तो लोगों की लाईन लगी रहती हैं. अगर कोई निस्वार्थ सेवा करना चाहता हैं. तब आप अपना नाम, पता और फ़ोन नं. मुझे ईमेल कर दें और सेवा करने में कौन-सा समय और कितना समय दे सकते हैं लिखकर भेज दें. मैं आपके पास ही के क्षेत्र के लोग मदद प्राप्त करने के लिए भेज देता हूँ. दोस्तों, यह भारत देश हमारा है और साबित कर दो कि-हमने भारत देश की ऐसी धरती पर जन्म लिया है. जहाँ "इंसानियत" से बढ़कर कोई "धर्म" नहीं है और देश की सेवा से बढ़कर कोई बड़ा धर्म नहीं हैं. क्या हम ब्लोगिंग करने के बहाने द्वेष भावना को नहीं बढ़ा रहे हैं? क्यों नहीं आप सभी व्यक्ति अपने किसी ब्लॉगर मित्र की ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं और किसी को आपकी कोई जरूरत (किसी मोड़ पर) तो नहीं है? कहाँ गुम या खोती जा रही हैं हमारी नैतिकता?

    मेरे बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि- आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला के लिए जुनून अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं. यह पता नहीं कितना सच है, मगर अंजाने में हुई किसी प्रकार की गलती के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. अब देखते हैं मुझे मेरी गलती का कितने व्यक्ति अहसास करते हैं और मुझे "क्षमादान" देते हैं.
    आपका अपना नाचीज़ दोस्त रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

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  25. श्रीमान जी, मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

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  26. प्रिय दोस्तों! क्षमा करें.कुछ निजी कारणों से आपकी पोस्ट/सारी पोस्टों का पढने का फ़िलहाल समय नहीं हैं,क्योंकि 20 मई से मेरी तपस्या शुरू हो रही है.तब कुछ समय मिला तो आपकी पोस्ट जरुर पढूंगा.फ़िलहाल आपके पास समय हो तो नीचे भेजे लिंकों को पढ़कर मेरी विचारधारा समझने की कोशिश करें.
    दोस्तों,क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से
    श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी लगाये है.इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है.मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
    क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ.
    अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?
    यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

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