मैं एक गाँव में गरीब परिवार में जन्मा। पिताजी हिन्दी पढना-लिखना जानते थे। परिवार में ही नहीं, बल्कि पूरे कुटुम्ब में अन्य कोई साक्षर भी नहीं था। मैं अपने माता-पिता की दूसरी जीवित सन्तान एवं सबसे बडा पुत्र हूँ। तीन छोटे भाई और एक बड़ी एवं एक छोटी बहन हैं।
मुझे छह वर्ष की आयु में गाँव के स्कूल में प्रवेश दिलाया गया और मात्र तीसरी पास करते ही मुझे मेरे पिताजी के स्थानीय दुश्मनों के कारण (1969 में) स्कूल छोडने को विवश होना पडा।
पिताजी की जमीन छीन ली गयी। जिसके चलते 1973 तक के साल मैंने दो रुपये प्रतिमाह प्रति जानवर की मजदूरी पर, गाय-भैंसों के चरवाहे के रूप में गुजारे। 1974 में स्थितियाँ बदल गयी। जमीन वापस मिल गयी, तो पिताजी के सहयोगी के रूप में 1976 तक खेती का काम किया।
जनवरी 1977 में मेरे छोटे भाई-बहनों को घर पर ट्यूशन बढाने आने वाले अध्यापक से मेरी फिर से पढाई शुरू करवाने पर पिताजी ने चर्चा की, जिस पर उन्होंने मेरी परीक्षा ली। मुझसे चार अंकों की संख्या अर्थात् चार हजार पाँच सौ पिच्यानवें लिखने को कहा तो मैंने 4595 लिखने के बजाय लिखा 4000, 500, 95 अर्थात् मैं तब तक तीसरी कक्षा तक की पढाई को भी भूल चुका था। जिसे जानकर अध्यापक ने कह दिया कि ये लडका नहीं पढ सकता। लेकिन मेरे पिताजी ने बार-बार आग्रह किया और मुझे फिर से पढाने का निर्णय लिया गया।
फरवरी, 1977 में मुझे ट्यूशन पढाना शुरू कर दिया। अगस्त या सितम्बर, 1977 में दसवीं कक्षा का प्राईवेट फार्म भरवा दिया गया।
इस बीच मुझे अंग्रेजी को एबीसीडी से शुरू करके, गणित, विज्ञान, हिन्दी, संस्कृत अनिवार्य विषयों के साथ, अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र, हिन्दी साहित्य वैकल्पिक विषय पढने को दिये गये।किसी को आशा नहीं थी कि मैं 13 महिने में सात वर्ष की पढाई करके पास भी हो सकता हूँ! मेरे गाँव में तीन बार से दस बार तक दसवीं में फैल होने वालों की संख्या अच्छी खासी थी। इसलिये मुझे उत्साहित करने के बजाय निराश करने वालों की संख्या ही अधिक थी।
फिर भी न जाने कौनसी ताकत थी, कि मुझे अपने आप पर विश्वास था। अनेक लोग तो मेरे पिताजी के इस निर्णय का मजाक भी उडाया करते थे। मैंने जितनी मेहनत की थी, उसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता! वास्तव में रात-दिन एक कर दिये और मार्च, 1978 में दसवीं की परीक्षा दी। कुछ माह बाद परिणाम सामने आया और मैं तृतीय श्रेणी में पास हो गया!
जिस गणित में जनवरी, 1977 में, मैं चार अंकों की संख्या लिखना नहीं आती थी, उसमें मेरे 70 फीसदी अंक आये। कुल मिलाकर 44 फीसदी अंक प्राप्त हुए। एक फीसदी की कमी के चलते मुझे द्वितीय श्रेणी नहीं मिली। जिसका मुझे आज भी पछतावा है! काश मैंने थौडी मेहनत ओर की होती। खैर....?
इस प्रकार 1969 में स्कूल छूटने के बाद 1978 में फिर से मेरा स्कूल शुरू हो गया। ग्यारहवीं कक्षा में नियमित छात्र के रूप में प्रवेश लेकर द्वितीय श्रेणी में परीक्षा पास की। 1979 में कॉलेज में पहुँच गया। जहाँ पर स्थानीय विधायक (अब दिवगंत) के करीबी गुण्डे की दादागीरी, रैंगिंग और मनमानियों का खुलकर विरोध करके मैंने खूब वाहवाही लूटी। जिसके चलते कॉलेज का माहौल पढाई के लायक बन गया। मैं जब तक कॉलेज में था, रैंगिंग पूरी तरह से भुलादी गयी। मैं पढने में ठीकठाक था। अपनी कक्षा के प्रथम तीन छात्रों में शामिल हुआ करता था।
अचानक फिर से पढाई छूट गयी। अन्तिम वर्ष की तैयारी कर रहा था। मई, 1982 में परीक्षाएँ होने वाली थी। मैं एक मन्दिर के अहाते में कमरा किराये से लेकर रहता था। 14 अप्रेल, 1982 का दिन था, मैं किसी काम से कस्बे से बाहर गया हुआ था। इसी दिन कथित रूप से मन्दिर के पुजारी (अब दिवगंत) ने एक 13 वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार किया। बलात्कार के अगले दिन रहस्यमय परिस्थितियों में बच्ची की मृत्यु हो गयी।
पुलिस ने घटनास्थल से पुजारी को पकड लिया। स्थानीय लोगों का कहना था कि मृत्यु से पूर्व बच्ची ने पुजारी के खिलाफ बयान भी दिया था। स्थानीय समाचार पत्रों में भी इस बारे में समाचार प्रकाशित हुए थे, लेकिन विधायक को जैसे ही पता चला कि उसके करीबी गुण्डे का विरोध करने वाला अर्थात् मैं भी मन्दिर में किरायेदार था। विधायक ने राज्य के गृहमन्त्री (अब दिवंगत) से दबाव डलवाकर पुजारी को तो छुडवा दिया और मेरे नाम से मुकदमा दर्ज करवा दिया।
पुजारी स्थानीय विधायक की पार्टी का अच्छा कार्यकर्ता था। इसके अलावा मेरे पिताजी की जमीन छीनने वाले दुश्मनों का विधायकजी से करीब का नाता था।
1 मई, 1982 को पुलिस ने अपहरण, बलात्कार एवं हत्या के आरोप में मुझे गिरफ्तार कर लिया।
क्रमश: जारी.........
1- मैं यह अवश्य चाहता हूँ कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।
2- थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।
3- यदि आप मुझे मेल करना चाहें तो मेरा मेल आईडी निम्न है। कृपया व्यक्तिगत सवाल नहीं करे।
umraquaidi@gmail.com
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